मुंबई: मुंबई की राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने पहली बार मुंबई की सत्ता अपने हाथ में ले ली है और इस तरह ठाकरे परिवार का 28 साल पुराना शासन समाप्त हो गया है।
करीब तीन दशकों तक मुंबई की राजनीति पर शिवसेना का दबदबा रहा। पहले बालासाहेब ठाकरे और बाद में उनके बेटे उद्धव ठाकरे ने शहर की कमान संभाली। लेकिन इस बार के चुनाव में बीजेपी ने कई अहम वार्डों में जीत दर्ज कर बहुमत हासिल किया।
हालांकि, सत्ता हाथ से जाने के बावजूद उद्धव ठाकरे पूरी तरह कमजोर नहीं हुए हैं। चुनाव नतीजों से साफ है कि उन्होंने मुंबई के मराठी मतदाताओं का भरोसा बनाए रखा है। खासतौर पर मध्य मुंबई और पारंपरिक शिवसेना इलाकों में उन्हें अच्छा समर्थन मिला है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह नतीजा दोहरी तस्वीर दिखाता है। एक तरफ बीजेपी ने प्रशासनिक नियंत्रण हासिल किया है, वहीं दूसरी ओर उद्धव ठाकरे मुंबई में सबसे मजबूत विपक्षी नेता बनकर उभरे हैं।
बीजेपी की जीत के पीछे मजबूत संगठन, आक्रामक चुनाव प्रचार और मध्यम वर्ग व गैर-मराठी मतदाताओं का समर्थन अहम माना जा रहा है। पार्टी का कहना है कि जनता ने विकास, पारदर्शिता और बेहतर शहर प्रशासन के लिए वोट दिया है।
वहीं शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) के लिए यह नतीजा चेतावनी भी है और मौका भी। सत्ता भले ही चली गई हो, लेकिन मराठी वोट बैंक बनाए रखने से उद्धव ठाकरे की राजनीतिक भूमिका अभी भी मजबूत बनी हुई है।
अब बीजेपी के नेतृत्व में मुंबई एक नए प्रशासनिक दौर में प्रवेश कर रही है, जहां उद्धव ठाकरे की अगुवाई में मजबूत विपक्ष की भूमिका अहम रहेगी।



